

desertcart.com: Jaun Elia: Ek Ajab Ghazab Shayar: 9789384419998: Books Review: Book quality is literally good 👍😊 and the content in this next level Review: Valuable and value for money.best Book best athour.
| Best Sellers Rank | #195,967 in Books ( See Top 100 in Books ) |
| Customer Reviews | 4.5 4.5 out of 5 stars (1,883) |
| Dimensions | 7.99 x 10 x 1.85 inches |
| ISBN-10 | 9384419990 |
| ISBN-13 | 978-9384419998 |
| Item Weight | 1.43 pounds |
| Language | Hindi |
R**N
Book quality is literally good 👍😊 and the content in this next level
G**H
Valuable and value for money.best Book best athour.
A**K
Overhyped ,Good Only for those who love urdu Book and pages quality is super
U**G
जौन एलिया एक अजब गजब शायर मुन्तजिर फिरोजाबादी हिन्द युग्म कुछ शेर पुस्तक से जो मुझे अच्छे लगे आप लोगो से साझा कर रहा हूँ चारसाजो की चरासाजी से दर्द बदनाम तो नहीं होगा हाँ दवा दो, मगर ये बतला दो, मुझको आराम तो नहीं होगा चारसाजो- चिकित्सकों (यह पुस्तक मे ही अर्थ दिये हुए है पाठक की सहायता के लिए ) रंग की अपनी बात है वरना आखिरश खून भी तो पानी है यूँ जो तकता है आसमान को तू कोई रहता है आसमान मे क्या? ये मुझे चैन क्यों नहीं पड़ता एक ही शख्स था जहान मे क्या? मिल रही हो बड़े तपाक के साथ मुझको यक्सर भुला चुकी हो क्या तपाक - गर्मजोशी यक्सर - पूरा एक हुनर है जो कर गया हूँ मै सब के दिल से उतर गया हूँ मै आज का दिन भी ऐश गुजरा सर से पा तक बदन सलामत है बिन तुम्हारे कभी नहीं आई क्या मिरी नींद भी तुम्हारी है नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम एक ही हादसा तो है और वो ये के आज तक बात नहीं कही गई बात नहीं सुनी गई ज़ख्म पहले के अब मुफीद नहीं अब नये जख्म खाए जायेंगे मुफीद - फायदा करने वाला तू भी चुप है मै भी चुप हूँ ये कैसी तन्हाई है तेरे साथ तेरी याद आई, क्या तू सचमुच आई है बहुत नजदीक आती जा रही हो बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या सब दलीले तो मुझको याद रही बहस क्या थी उसी को भूल गया सब बुरे मुझको याद रहते है जो भला था उसी को भूल गया आग, दिल शहर मे लगी जिस दिन सबसे आखिर मे वाँ से हम निकले कभी ख़ुद से मुकर जाने मे क्या है मै दस्तावेज पे लिखा हुआ नई अपने सब यार काम कर रहे है और हम है कि नाम कर रहे है है अजब फैसले का सहरा भी चल न पड़िये तो पाँव जलते है सहरा - रेगिस्तान तुझको भूला नहीं वो शख्स कि जो तेरी बाँहो मे भी अकेला था इक नफ़स है दो नफ़स के बीच होके हाइल पड़ा तड़पता है नफ़स - साँस हाइल - बीच मे गिरने वाली अन तमीरो मे भी एक़ सलीका था तुम ईटो कि पूछ रहे हो मिट्टी तक हमवार गिरी तमीरो - बनी हुई इमारते हमवार - एक़ साथ ये पैहम तल्ख़कामी सी रही क्या? मुहब्बत जहर खा के आई थी क्या? पैहम- लगातार तल्ख़कामी- कड़वाहट बे-दली क्या यूँही दिन गुजर जाएंगे सिर्फ जिन्दा रहे हम तो मर जाएंगे बे-दली- उदासी मै रहा उम्र भर जुदा ख़ुद से याद मै ख़ुद को उम्र भर आया तुम ने एहसान किया था जो हमें चाहा था अब वो एहसान जता दो तो मजा आ जाए किसी सूरत उन्हें नफरत हो हमसे हम अपने ऐब ख़ुद गिनवा रहे हैं और भी बहुत ज्यादा कुछ हैं ❤️❤️....... एक़ पाठक कि कलम से CA CS उत्कर्ष गर्ग
A**A
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